ब्रह्मचर्य: योग की शुरुआत और साधना की जड़
योग के कुल आठ अंग हैं, इसमें से पहला अंग 'यम' है | यम के पांच उपांग है अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह | ब्रह्मचर्य योग की यात्रा में आरंभिक और अनिवार्य चरण है। मतलब बिना ब्रह्मचर्य के योग में स्थिरता, ध्यान में गहराई और समाधि में प्रवेश संभव नहीं। ब्रह्मचर्य का मतलब वह व्यक्ति जो अपनी समस्त ऊर्जा (शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक) को ईश्वर, साधना, अध्ययन या आत्म-विकास में लगाता है, तो वही ब्रह्मचारी कहलाता है। पर आज कल लोग इसे सिर्फ कामवासना पर नियंत्राण समझते है | अब आप समझ गए होंगे, अगर आप ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे होतो, आप योग के पहले अंग में हो |
ब्रह्मचर्य का योग में इतना महत्व क्यों ?
योग में हमारी प्राणशक्ति अत्यंत मूल्यवान है। ब्रह्मचर्य के पालन से यह शक्ति नष्ट नहीं होती, बल्कि ऊपर की ओर (कुण्डलिनी मार्ग में) प्रवाहित होती है। योग में मन का स्थिर होना जरुरी है, पर कामना हमारे मन को अस्थिर कर देती है। ब्रह्मचर्य पालन से मन स्थिर, शांत और एकाग्र बनता है। ब्रह्मचर्य से मन की वासनाएँ शांत होकर आत्मा की ओर मुड़ती हैं, इसको हम आत्म-साक्षात्कार कहते है | यह योग का अंतिम लक्ष्य है।
योग ही नहीं विज्ञान भी ब्रह्मचर्य (सेल्फ-रेस्ट्रेंट) को अच्छा मानता है | विज्ञान के अनुसार ब्रह्मचर्य (सेल्फ-रेस्ट्रेंट) से हमारा नर्वस सिस्टम मजबूत होता है, मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है और डोपामिन-संतुलन के कारण फोकस, क्रिएटिविटी और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। और अगर आपने योग का पूरी तरहा से प्रयोग किया, तो इन प्रभावों को और गहराई से स्थायी बना देता है।
“ब्रह्मचर्य बिना योग अधूरा है,
और योग बिना ब्रह्मचर्य निष्फल है।”
ब्रह्मचर्य योग की जड़ है,
और योग ब्रह्मचर्य का फूल और फल —
जहाँ संयम, शांति, और आत्मसाक्षात्कार की सुगंध फैलती है।