भगवद्गीता में ब्रह्मचर्य का स्थान: रोज एक ब्रह्मचर्य लेख पढ़ने का महत्व

November 10, 2025 • By Shubham Vishwakarma

भगवद्गीता में ब्रह्मचर्य का स्थान: रोज एक ब्रह्मचर्य लेख पढ़ने का महत्व (Featured Image)

ब्रह्मचर्य के बारे में आपने बहुत बार सुना होगा या फिर कहीं पढ़ा होगा | ब्रह्मचर्य के बहुत से आर्टिकल और वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध है | अगर ब्रह्मचर्य के बारे में जानते है तो ये बहुत अच्छी बात है | आज के समय में ब्रह्मचर्य जीवन जीना बहुत मुश्किल है | अगर आप ब्रह्मचर्य जीवन जीना चाहते हैं तो रोज एक ब्रह्मचर्य का लेख जरूर पढ़े | कम से कम ये काम आपको छह महीने तक करना है | हम इस लेख में आज हम जानेंगे भगवद्गीता में ब्रह्मचर्य का स्थान कहां है | 


भगवद्गीता केवल युद्ध का संवाद नहीं है, यह हमारे जीवन को समझने और आत्मा को जानने का सर्वश्रेठ शास्त्र है | इसमें भगवान श्री कृष्ण ने हमरे जीवन के हर क्षेत्र पर गहन प्रकाश डाला है। इसमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है “ब्रह्मचर्य”, जिसे गीता में आत्मिक साधना की नींव कहा गया है। आज के समय में ब्रह्मचर्य  का अनुसरण करना मतलब आप सबसे महान काम कर रहे हो |  ब्रह्मचर्य  केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और इच्छाओं का नियंत्रण है। जिसने  तीनो पर नियंत्रण कर लिया, वह संसार का सबसे खुशी इंसान होता है |

 

गीता के अध्याय 6 और 8 में ब्रह्मचर्य का प्रत्यक्ष उल्लेख

अध्याय 6  - ध्यान योग

“प्रशान्तात्मा विगतभीः ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥”

भावार्थ:
हे अर्जुन! योगी को चाहिए कि वह भय और वासना से रहित,
ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित होकर, अपने मन को संयमित करे और परमात्मा में एकाग्र होकर ध्यान लगाए।

अर्थ:

इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि ध्यान और योग की सिद्धि के लिए ब्रह्मचर्य आवश्यक शर्त है।
बिना ब्रह्मचर्य के मन को स्थिर और एकाग्र करना असंभव है।

अध्याय 8 — अक्षर ब्रह्म योग

“यदक्षरं वेदविदो वदन्ति यत् यज्ञिनो ब्रह्मचर्यं चरन्ति।
तत् ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये — सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च॥”

भावार्थ:

हे अर्जुन! वह अक्षर (परम सत्य) जिसे वेदों के ज्ञानी जानने का प्रयास करते हैं,
और जिसके लिए यज्ञ करने वाले ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं,
मैं अब उस परम पद को संक्षेप में बताऊँगा —
जो सभी इंद्रियों को संयमित करके और मन को हृदय में स्थिर करके प्राप्त होता है।

अर्थ:
इस श्लोक में ब्रह्मचर्य को ब्रह्मज्ञान (ईश्वर-प्राप्ति) की कुंजी बताया गया है।
जो साधक ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वही अपने मन को स्थिर कर परमात्मा तक पहुँच सकता है।

गीता के अनुसार, मन की स्थिरता के लिए हमे जीवन में एक बार ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए | श्रीकृष्ण ने कहा है की ब्रह्मचर्य हमारे ओज, स्मृति और विवेक को बढ़ाता है। जब मनुष्य ब्रह्मचर्य का पालन करता है तो उसका मन और इंद्रियाँ नियंत्रित होती हैं, जिससे व्यक्ति हर कर्म में शांति, विवेक और सामंजस्य बनाए रखता है। और हमारी इंद्रियाँ विषयों की ओर दौड़ती हैं, ब्रह्मचर्य उन्हें एक दिशा में स्थिर रखता है। इससे व्यक्ति अपने भीतर की चेतना (आत्मा) को अनुभव कर पाता है।

भगवद्गीता के अनुसार ब्रह्मचर्य केवल व्रत नहीं — बल्कि आत्मा की ऊँचाई की ओर पहला कदम है।

अगर आप ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे है तो रोज एक लेख ब्रह्मचर्य का जरूर पढ़े | जब आप  रोज़ ब्रह्मचर्य पर कुछ पढ़ते हो तो आपका मन उस विषय की ऊर्जा से जुड़ जाता है। फिर हमारा मन उसी विषय पर स्थिर होता है | अगर आप हर दिन “संयम, शुद्धता, शक्ति” जैसे विचार पढ़ते हो, तो धीरे-धीरे तुम्हारे विचारों की दिशा वासना से उठकर आध्यात्म की ओर मुड़ने लगती है। “जैसा मन पढ़ता है, सोचता है, वैसा ही बनता है।” – यह मनोविज्ञान और अध्यात्म दोनों की सच्चाई है।

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